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काशीपुर। द गुरुकुल फाउंडेशन स्कूल में भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक शिक्षा, नवाचार तथा भविष्य उन्मुख शिक्षण पद्धतियों पर केंद्रित आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर डॉ. दीपक परमशिवन का तीन दिवसीय प्रेरणादायक एवं चिंतनशील शैक्षणिक भ्रमण आयोजित किया गया।

इस भ्रमण का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा, स्टीम (STEAM), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), नैतिक नेतृत्व, जीवन मूल्यों तथा वैश्विक दृष्टिकोण के साथ जोड़ते हुए शिक्षा को अधिक अनुभवात्मक, उद्देश्यपूर्ण और भविष्य उन्मुख बनाना था। तीन दिनों के दौरान डॉ. दीपक परमशिवन ने विद्यालय की शैक्षिक दृष्टि, शिक्षण पद्धतियों तथा गुरुकुल दर्शन से प्रेरित शिक्षण वातावरण का गहन अवलोकन किया।

उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल जानकारी प्रदान करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें जिज्ञासा, तार्किक चिंतन, सृजनात्मकता, संवेदनशीलता तथा जीवन को व्यापक दृष्टिकोण से समझने की क्षमता विकसित होनी चाहिए। भ्रमण के तीसरे दिन सोमवार, 25 मई 2026 को “भविष्य उन्मुख शिक्षा के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा : परंपरा, नवाचार और वैश्विक तैयारी के मध्य संतुलन” विषय पर एक महत्वपूर्ण पैनल चर्चा आयोजित की गई। पैनल में डॉ.दीपक परमशिवन, प्रोफेसर, आईआईटी मद्रास; डॉ. वैभव भामोरिया, प्रोफेसर, आईआईएम काशीपुर; डॉ.  वसुधा कपूर, निदेशक, द गुरुकुल फाउंडेशन स्कूल;  पद्मलता सुरेश, विजिटिंग प्रोफेसर, IIIMs एवं वरिष्ठ सलाहकार, द गुरुकुल फाउंडेशन स्कूल; मीनल बधवार प्रधानाचार्या, द गुरुकुल फाउंडेशन स्कूल; तथा विभा तिवारी प्रधानाचार्या द गुरुकुल फाउंडेशन स्कूल (अर्ली ईयर्स कैंपस) शामिल रहे। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में  राम मेहरोत्रा अध्यक्ष उत्तराखंड राज्य सहकारी संघ; डॉ. दीपिका गुड़िया आत्रेय चेयरमैन एस.सी. गुड़िया इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड लॉ कॉलेज; तथा विशेष आमंत्रित संजय कुमार सिंह, प्रोजेक्ट ऑफिसर, आईआईएम काशीपुर की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर द गुरुकुल फाउंडेशन के चेयरमैन  नीरज कपूर,  कामाक्षी कपूर (जेएमडी, द गुरुकुल फाउंडेशन स्कूल) तथा  शुभांगी शर्मा, उपप्रधानाचार्या, द गुरुकुल फाउंडेशन स्कूल भी उपस्थित रहीं।

पैनल चर्चा के दौरान डॉ. दीपक परमशिवन ने भारतीय ज्ञान परंपरा को प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के मध्य एक सशक्त सेतु बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली आधुनिक विज्ञान का विकल्प नहीं, बल्कि उसका महत्वपूर्ण पूरक है, जो विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हुए आधुनिक तकनीक एवं वैश्विक चुनौतियों के लिए तैयार करती है।

उन्होंने यह भी बताया कि ओसीआर (OCR) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी आधुनिक तकनीकों के माध्यम से प्राचीन ग्रंथों में संरक्षित ज्ञान को वर्तमान पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुँचाया जा सकता है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की समग्रता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन भारत में ज्ञान को अलग-अलग विषयों में विभाजित नहीं किया जाता था। गणित, विज्ञान, कला, संगीत, दर्शन, प्रकृति, भाषा और जीवन मूल्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे।

भास्कराचार्य के उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने समझाया कि भारतीय परंपरा में गणित केवल संख्याओं तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें कविता, सौंदर्य, तर्क और गहन चिंतन भी समाहित था। उनका मुख्य संदेश था कि सच्ची शिक्षा विद्यार्थियों को सोचने, प्रश्न करने, समझने और जीवन में सही दिशा चुनने की क्षमता प्रदान करती है।

आईआईएम काशीपुर के प्रोफेसर डॉ. वैभव भामोरिया ने भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित नेतृत्व, प्रबंधन, नैतिकता और दीर्घकालिक चिंतन की प्रासंगिकता पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चार पुरुषार्थों का उल्लेख करते हुए आधुनिक जीवन एवं शिक्षा में उनकी उपयोगिता को स्पष्ट किया।

उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल सफलता प्राप्त करना नहीं, बल्कि कर्तव्यबोध, सार्थक कर्म, संतुलित जीवन और आंतरिक विकास को विकसित करना भी है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा जटिल समकालीन समस्याओं को समग्र दृष्टिकोण से समझने और उनके समाधान खोजने की प्रेरणा देती है। पैनल चर्चा का प्रभावी संचालन पद्मलता सुरेश द्वारा किया गया।

उन्होंने सभी वक्ताओं के विचारों को विद्यालयी शिक्षा, शिक्षकों की भूमिका तथा भविष्य की शिक्षण प्रणालियों से जोड़ते हुए चर्चा को संतुलित, सार्थक और उद्देश्यपूर्ण दिशा प्रदान की। डॉ.  वसुधा कपूर ने विद्यालयी शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा को अंतर्विषयी दृष्टिकोण के माध्यम से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को एक अलग विषय के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षण प्रक्रिया, गतिविधियों, प्रोजेक्ट्स और जीवन मूल्यों के माध्यम से स्वाभाविक रूप से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थी अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक विश्व की आवश्यकताओं के लिए तैयार हो सकें।

प्रधानाचार्या  मीनल बधवार ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का वास्तविक समावेश तभी संभव है जब वह केवल प्रतीकों, पोस्टरों और विशेष अवसरों तक सीमित न रहकर बच्चों के दैनिक शिक्षण अनुभवों का हिस्सा बने। उन्होंने प्रकृति अवलोकन, कहानियों, संवाद, कला, संगीत और अनुभवात्मक गतिविधियों के माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रणाली को प्रभावी ढंग से कक्षा शिक्षण में जोड़ने पर बल दिया। अर्ली ईयर्स कैंपस की प्रधानाचार्या  विभा तिवारी ने प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा के स्वाभाविक और अनुभवात्मक समावेश पर अपने विचार रखे।

उन्होंने कहा कि छोटे बच्चों के लिए भारतीय ज्ञान प्रणाली को जटिल सिद्धांतों के रूप में नहीं, बल्कि कहानियों, प्रकृति अवलोकन, गीत-संगीत, कला, जीवन मूल्यों, दैनिक दिनचर्या और खेल आधारित गतिविधियों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब बच्चे संस्कृति, प्रकृति और मूल्यों को आनंदपूर्ण शिक्षण के माध्यम से अनुभव करते हैं, तब उनमें स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा, संवेदनशीलता, अनुशासन, आत्मविश्वास और नैतिक समझ विकसित होती है। कार्यक्रम के समापन पर द गुरुकुल फाउंडेशन के चेयरमैन नीरज कपूर ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने सभी विशिष्ट अतिथियों, पैनल सदस्यों, विद्यालय नेतृत्व, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे सार्थक शैक्षणिक संवाद शिक्षा को नई दिशा प्रदान करते हैं और विद्यालय को मूल्य आधारित, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध तथा भविष्य उन्मुख शिक्षा की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देते हैं।
डॉ. दीपक परमशिवन का यह तीन दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण विद्यालय समुदाय के लिए अत्यंत प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक सिद्ध हुआ। इस भ्रमण ने यह समझ विकसित की कि यदि भारतीय ज्ञान परंपरा को सही दृष्टिकोण, शोध आधारित योजना तथा अनुभवात्मक पद्धति के साथ लागू किया जाए, तो यह विद्यार्थियों में आत्मगौरव, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सृजनात्मकता, नैतिकता, संवेदनशीलता, नेतृत्व क्षमता तथा सामाजिक उत्तरदायित्व के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। द गुरुकुल फाउंडेशन स्कूल में आयोजित यह तीन दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण परंपरा, नवाचार और वैश्विक तैयारी के संतुलित समन्वय की दिशा में एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक पहल सिद्ध हुआ। इसने यह प्रेरणादायक संदेश दिया कि भविष्य की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़े, उन्हें तकनीक से सशक्त बनाए तथा उन्हें संवेदनशील, नैतिक, आत्मविश्वासी और वैश्विक दृष्टिकोण रखने वाले जिम्मेदार नागरिकों के रूप में विकसित करे।

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