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— जुगनू खान, काशीपुर

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की सबसे बड़ी पहचान उनके व्यवहार, कार्यशैली और आम नागरिकों के प्रति उनके दृष्टिकोण से होती है। हाल ही में मुझे काशीपुर से देहरादून जाने का अवसर मिला। इस यात्रा का उद्देश्य केवल कुछ लोगों से मिलना ही नहीं था, बल्कि यह भी जानना था कि प्रदेश स्तर पर राजनीतिक दलों और शासन-प्रशासन का आम नागरिकों के प्रति व्यवहार कैसा है। इस दौरान मुझे ऐसे अनुभव हुए, जिन्होंने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर जनता किसी संगठन या दल से क्या अपेक्षा रखती है। मैं काशीपुर से लंबा सफर तय कर सबसे पहले कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय पहुंचा। एक आम नागरिक और पत्रकार के रूप में मेरी अपेक्षा थी कि वहां आने वाले लोगों से संवाद किया जाएगा, उनकी बात सुनी जाएगी और उनके आने का उद्देश्य जानने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन कार्यालय में पहुंचने के बाद जो दृश्य देखने को मिला, वह मेरी अपेक्षाओं के बिल्कुल विपरीत था। कार्यालय में मौजूद अधिकांश लोग अपने-अपने समूहों में व्यस्त दिखाई दिए। कोई किसी नेता के साथ बैठा था तो कोई राजनीतिक चर्चाओं में मशगूल था। मुझे ऐसा महसूस हुआ कि वहां किसी बाहरी व्यक्ति की उपस्थिति का कोई विशेष महत्व नहीं है। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि मैं कहां से आया हूं, किस उद्देश्य से आया हूं या मेरी क्या आवश्यकता है। एक आगंतुक के रूप में यह अनुभव निराशाजनक था। मुझे लगा कि यदि कोई व्यक्ति दूर-दराज से किसी राजनीतिक दल के प्रदेश कार्यालय तक पहुंचता है तो कम से कम उससे यह पूछना तो आवश्यक है कि वह किस कारण आया है। जनता और कार्यकर्ताओं से संवाद ही किसी भी राजनीतिक संगठन की ताकत होता है। यदि संगठन के द्वार आम लोगों के लिए खुले नहीं होंगे और उनकी बात सुनने की संस्कृति विकसित नहीं होगी, तो जनता का विश्वास भी कमजोर पड़ता है। कांग्रेस कार्यालय से निकलने के बाद मैंने मुख्यमंत्री आवास जाने का निर्णय लिया। मेरे मन में यह जिज्ञासा थी कि वहां का वातावरण कैसा होगा और आम नागरिक के प्रति वहां का व्यवहार कैसा रहता है। मुख्यमंत्री आवास पहुंचने पर मेरा अनुभव बिल्कुल अलग रहा। मुख्यमंत्री आवास के मुख्य द्वार पर तैनात सुरक्षा कर्मियों ने अत्यंत विनम्रता और सम्मान के साथ मेरी बात सुनी। उन्होंने मुझे उचित कार्यालय तक पहुंचने का मार्ग बताया और कहा कि मैं वहां जाकर अपना नाम, पता और मिलने का उद्देश्य दर्ज करा दूं। उनके व्यवहार में शिष्टता और सहयोग की भावना स्पष्ट दिखाई दी। जब मैं संबंधित कार्यालय पहुंचा तो वहां भी मेरा सम्मानपूर्वक स्वागत किया गया। मुझे बैठने के लिए कहा गया और कुछ ही देर में पीने के लिए पानी उपलब्ध कराया गया। वहां मौजूद अधिकारियों और कर्मचारियों ने बड़े विनम्र तरीके से पूछा कि मैं किस संबंध में मुख्यमंत्री से मिलना चाहता हूं। मैंने उन्हें बताया कि मैं काशीपुर से आया हूं और मुख्यमंत्री से मुलाकात की इच्छा रखता हूं। मेरी जानकारी दर्ज की गई और पूरी प्रक्रिया सम्मानजनक ढंग से पूरी की गई। हालांकि उस समय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अत्यंत व्यस्त कार्यक्रम में थे और उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय भुवन चंद खंडूरी जी के आवास पर जाना था, इसलिए मुलाकात संभव नहीं हो सकी। लेकिन इसके बावजूद वहां के अधिकारियों और कर्मचारियों का व्यवहार अत्यंत सकारात्मक और सम्मानजनक रहा। इस पूरे अनुभव ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि किसी भी संगठन या व्यवस्था की असली पहचान उसके पदों और भवनों से नहीं, बल्कि वहां कार्यरत लोगों के व्यवहार से होती है। एक व्यक्ति जब सम्मान प्राप्त करता है, उसकी बात सुनी जाती है और उसे महत्व दिया जाता है, तो उसके मन में उस संस्था के प्रति विश्वास और सम्मान स्वतः बढ़ जाता है मेरे व्यक्तिगत अनुभव में कांग्रेस प्रदेश कार्यालय और मुख्यमंत्री आवास के वातावरण में स्पष्ट अंतर दिखाई दिया। जहां कांग्रेस कार्यालय में मुझे संवाद और आत्मीयता का अभाव महसूस हुआ, वहीं मुख्यमंत्री आवास में एक सामान्य नागरिक के रूप में मुझे सम्मान, सहयोग और सकारात्मक व्यवहार का अनुभव हुआ। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों के लिए यह आवश्यक है कि वे आम नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करें, उनकी बात सुनें और उन्हें यह एहसास कराएं कि उनकी उपस्थिति महत्वपूर्ण है। जनता का विश्वास केवल भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि व्यवहार और संवेदनशीलता से जीता जाता है।मेरी यह यात्रा केवल देहरादून तक का सफर नहीं थी, बल्कि यह विभिन्न कार्यसंस्कृतियों और जनसंपर्क के तौर-तरीकों को समझने का एक अनुभव भी थी। और इस अनुभव ने मुझे यह महसूस कराया कि सम्मान, संवाद और संवेदनशीलता ही किसी भी संगठन की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

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